बिना बीमा वाले वाहन सड़क दुर्घटना राहत योजना में क्यों शामिल नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
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सुप्रीम कोर्ट का निर्देश और योजना की पृष्ठभूमि
सड़क दुर्घटनाओं में पीड़ितों के परिवारों को अंतरिम वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा तैयार की जा रही एक नई योजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत ने जानना चाहा है कि इस योजना का दायरा केवल बीमाकृत (insured) वाहनों तक ही क्यों सीमित रखा गया है और इसमें बिना बीमा वाले वाहनों को क्यों नहीं शामिल किया गया है।
यह मामला न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ के समक्ष आया। अदालत ने यह भी संज्ञान लिया कि 'पीड़ितों को मुआवजा (अंतरिम राहत) योजना, 2026' को अभी तक न तो अधिसूचित किया गया है और न ही इसका पर्याप्त प्रचार किया गया है। पीठ ने सरकार को निर्देश दिया कि इस योजना का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए ताकि आम जनता को अंतरिम मुआवजे की मांग करने के उनके अधिकारों के बारे में जानकारी मिल सके।
क्या है अंतरिम राहत का प्रावधान?
प्रस्तावित योजना के तहत सड़क दुर्घटना में मौत होने पर पीड़ित परिवार को 2 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायल होने पर 1 लाख रुपये की अंतरिम वित्तीय सहायता देने का प्रावधान है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, यह योजना केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम के प्रावधानों के तहत अधिसूचित की जाएगी। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मंत्रालय ने इस वर्ष 23 फरवरी को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ इस योजना का मसौदा साझा किया था। सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में मंत्रालय को यह योजना तैयार करने का निर्देश दिया था।
अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह योजना मोटर वाहन अधिनियम के उन प्रावधानों के तहत बनाई गई है जो बीमाकृत वाहनों से संबंधित हैं, इसलिए यह स्थिति उत्पन्न हुई है। यदि दुर्घटना में शामिल वाहन का बीमा नहीं है, तो ऐसे मामलों में मुआवजे का दावा मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के माध्यम से किया जाएगा।
कानूनी प्रावधान और एमएसीटी की भूमिका
अदालत ने योजना के खंड-6 का भी परीक्षण किया, जिसके तहत पीड़ितों या मृतक के कानूनी वारिस एक निर्धारित ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं और एमएसीटी के समक्ष दायर या लंबित दावों का विवरण दे सकते हैं।
अधिकारियों के अनुसार, अधिनियम की धारा 164 'नो-फाल्ट लायबिलिटी' (दोषरहित दायित्व) के तहत मौत के मामले में 5 लाख रुपये और गंभीर चोट के मामले में 2.5 लाख रुपये के भुगतान का प्रावधान करती है। इसमें आवेदक को यह साबित करने की आवश्यकता नहीं होती है कि मौत या चोट वाहन मालिक के किसी गलत कृत्य, उपेक्षा या चूक के कारण हुई थी। इसी आधार पर तत्काल राहत के रूप में अंतरिम सहायता को क्रमशः 2 लाख और 1 लाख रुपये तय किया गया है, जबकि अंतिम मुआवजा एमएसीटी के आदेश के अनुसार अधिक हो सकता है।
पाठकों के लिए व्यावहारिक जानकारी और सत्यापन
- क्या पुष्टि की गई है: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि बिना बीमा वाले वाहनों को इस योजना से क्यों बाहर रखा गया है। साथ ही, योजना के व्यापक प्रचार-प्रसार के निर्देश दिए गए हैं।
- क्या अज्ञात है: इस योजना की अंतिम अधिसूचना और बिना बीमा वाले वाहनों के मामलों को पूरी तरह से कैसे संभाला जाएगा, इस पर विस्तृत प्रशासनिक निर्देश अभी आने बाकी हैं।
- पाठक कैसे सत्यापित करें: पाठक इस मामले से जुड़े आधिकारिक विवरण और अपडेट के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया की मूल रिपोर्ट यहाँ देख सकते हैं।
AI की सहायता से तैयार रिपोर्ट; मूल स्रोत के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।
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